Thursday, March 10, 2016

हे बुद्धिजीवीयों



​मनुस्मृति ही क्यों, तुम 
वेद-पुराण भी जला डालो,
धर्म, शास्त्र, नीतियों को 
तुम हँसी में ही उड़ा डालो! 

वैसे भी इन्हे समझ पाना, 
तुम्हारे बस की बात नहीं,
'सत्य' भी क्या जलेगा कभी?-
तुम चाहे जितना जला डालो !

यह कुकृत्य भी नहीं ऐसा कि
सिर-कलम की बात भी होगी! 
प्रखर होगा प्रहार से धर्म ही
तो बात किस आघात की होगी?

निश्चय ही हे 'बुद्धिजीवीयों',
यह काल है मंथन का अभी,
विष-अमृत सब ही अलग होंगे,
तुम चाहे जितना मिला डालो!

Wednesday, August 5, 2015

जागो कर्मयोगी

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"तम-प्रकाश से पूछता रहा मैं- 
कौन हूँ मैं, कहो कौन हूँ मैं ? 
सब कुछ में कुछ भी नहीं मैं,
कुछ-कुछ में भी सब कुछ ही मैं!"
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सूर्य प्रखर है, तेज प्रहर है,
जगमग रौशन है जग सारा,​
सारी सृष्टि जाग चुकी है,
क्यों तेरे मन में अँधियारा ?

हर निशा का आँचल तुझको
दे गया है एक सितारा,
तम का आलिंगन होता है,
सदा नए सुबह का इशारा। 

ये भोर है जीने का, और
जी कर कुछ कर जाने का,
मुट्ठी बंद कर, खोल ले आँखें,
अवसर आते नहीं दोबारा!  

आज ठान ले आलस तज कर,
जीवन-कला की कहती ज्वाला-
'कर्मयोग' का पथ चलना है,
सुधि में भी औ' परे सुध-कारा!



Picture Courtesy: http://cdn.dailypainters.com/paintings/_other_side_of_the_earth__abstract_landscape_day_a_d8de0c0927cf4da0c56b51c39a0e669d.jpg

Friday, November 7, 2014

जीवन पूरन कर आई!



अरसों-बरसों से सूखी-सी
सब सन गयी औ' लिपट आई,
सुमनों से संचित मन की धरा
खुशबू से महक-महक आयी।

नव-जीवन अभिनन्दन हेतु
वंदन, चन्दन भी कर आई,
कर आलिंगन, मिल मन से मन
तन-मन सब अर्पण कर आई। 

जो बिम्ब बसा इन नयनों में,
उनपे ही नयन निमन आई,
नित-नित जो नव-नव रूप गढ़े,
उस नेह का नर्तन कर आई।

बहती श्वांसों की गंगा में,
वो डूबी, और उबर आई,
बस प्रेम को पाकर जाना कि
सब जीवन पूरन कर आई।


Picture Courtesy: http://www.layoutsparks.com/1/116318/what-is-love-abstract.html